
आज मानवों के चारों तरफ हिंसक पशुओं के रूप में बेरोजगारी मानों उसे जीवित ही उसे खा जाने के लिए मुॅंह बाए खड़ा है और हमारे नवयुवक इतनी बड़ी महंगाई की मार झेलते हुए माता पिता परिवार और स्व पोषण हेतु सरकारी नौकरी पाने के प्रयास में नाकों चने चबाने के बावजूद नौकरी मिलते मिलते रह जाती है । कुछ लोग दो चार बार प्रयास करने के बाद मायूस होकर प्राईवेट नौकरी हेतु रोजगार के बाजार में निकल पड़ते हैं और उसी में गरीब गुजारा करते हैं , जबकि कुछ लोग प्रयास करते करते पैंतीस चालीस के उम्र प्राप्त कर कहीं के नहीं रह जाते हैं ।
भारत में सरकारी नौकरी हेतु परीक्षा व्यवस्था को तो गलत नहीं कहा जा सकता , किंतु इस प्रतियोगितात्मक परीक्षा में आरक्षण लगाना परीक्षा व्यवस्था को दोषपूर्ण बनाता है जिसमें अस्सी पचासी नब्बे प्रतिशत अंक होते हुए भी सामान्य श्रेणी के अभ्यर्थी नौकरी से वंचित रह जाते हैं और पचास पचपन प्रतिशत अंक वाले अन्य जाति के लोग पदासीन हो जाते हैं । यह कहाॅं तक न्यायोचित है , विचार करने की बात है ।
आरक्षण का अर्थ यह नहीं कि किसी का हक छिनकर किसी और को देना , आरक्षण का अर्थ है कि वह गरीब है तो भोजन दो , वस्त्र दो और नि: शुल्क शिक्षा प्रदान करना ताकि वह भी प्रतियोगिता में वही भागीदारी निभाए जो सामान्य वर्ग के लोग निभाते हैं ।
भारत देश लोकतंत्र का देश है जबकि भारत देश में ही सरकारी नौकरी के प्रयास में परलोक भी सिधार जाते हैं । वैसे भी कहा जाता है कि आज के युग में भगवान दर्शन प्राप्त हो सकता है किंतु नौकरी असंभव सा हो गया है ।
एक और कहावत कही गई है कि ” सुख चाहो तो नौकरी करो , धन चाहो व्यापार ” । यही कारण है कि जन जन का प्रयास होता है सरकारी नौकरी प्राप्त करना , किंतु सेंधमारी भी होती है तो गरीबों के घर में ही । नौकरी की परमानेंसी छिन ली गई । सरकारी नौकरी में भी प्राईवेटीकरण होने लग गया , साठ वर्ष तक सरकारी सेवा करनेवालों का पेंशन छिन लिया गया , जो बुढ़ापे का सहारा था ।
कहने को तो बहुत कुछ त्रुटियाॅं हैं ।
सरकार को चाहिए कि सारी त्रुटियों को दूर करके पुनः पुराने आधार पर ही लागू करें तथा सरकारी नौकरी हेतु प्रतियोगितात्मक परीक्षा से आरक्षण हटाकर प्रतियोगी परीक्षा को दोषरहित बनाऍं ।
पूर्णतः मौलिक एवं
अप्रकाशित रचना
अरुण दिव्यांश
छपरा ( सारण )
बिहार ।













