
बेटियाँ केवल बेटियाँ नहीं होतीं,
वे घर की धड़कन होती हैं,
पिता के चेहरे की मुस्कान,
माँ की आँखों का दर्पण होती हैं।
नन्हे हाथों से जब आँगन में,
खुशियों के दीप जलाती हैं,
सूने-सूने से जीवन में,
सपनों के रंग सजाती हैं।
अपने हिस्से की धूप समेटे,
सबको छाया दे जाती हैं,
खुद दर्दों से लड़ती रहतीं,
पर मुस्कान बाँटती जाती हैं।
कभी बहन बनकर साथ निभाएँ,
कभी माँ बन ममता बरसाएँ,
हर रिश्ते को प्रेम से सींचें,
हर दुःख में संबल बन जाएँ।
फिर भी जाने क्यों इस जग में,
उनकी कीमत कम आँकी जाती है,
उनके सपनों की उड़ानों पर,
क्यों पहरेदारी लगाई जाती है?
जब एक बेटी रोती है,
तो मानवता भी रोती है,
उसकी आँखों का हर आँसू,
समाज की संवेदना खोती है।
बेटियाँ बोझ नहीं होतीं,
वे तो जीवन का आधार हैं,
उनसे ही घर, परिवार, समाज,
और संस्कृति के संस्कार हैं।
डॉ रुपाली गर्ग
मुंबई महाराष्ट्र













