
शिक्षा किसी भी समाज की रीढ़ होती है। यह न सिर्फ व्यक्ति का विकास करती है, बल्कि समानता और न्याय का रास्ता भी खोलती है। संविधान के नीति-निदेशक तत्वों में 14 वर्ष तक निःशुल्क और अनिवार्य शिक्षा का प्रावधान इसी सोच का परिणाम था। लेकिन 1991 के उदारीकरण के बाद शिक्षा का तेजी से निजीकरण हुआ। आज देश में निजी स्कूल, कॉलेज, कोचिंग और विश्वविद्यालयों की बाढ़ है। सवाल यह है कि शिक्षा के बाजारीकरण का सबसे बड़ा खामियाजा कौन उठा रहा है? जवाब साफ है—दलित, पिछड़े, आदिवासी, मजदूर और गरीब अवाम। 1990 तक शिक्षा मुख्यतः सरकारी जिम्मेदारी थी। पर नई आर्थिक नीति के बाद सरकार ने हाथ खींचना शुरू किया। बजट में शिक्षा पर खर्च GDP का 6% होना चाहिए था, पर आज भी 3% के आसपास है। इसका फायदा निजी क्षेत्र ने उठाया। आज K-12 से लेकर उच्च शिक्षा तक प्राइवेट संस्थानों का दबदबा है। UDISE 2021-22 के अनुसार देश के 25% से ज्यादा बच्चे निजी स्कूलों में पढ़ते हैं। उच्च शिक्षा में 65% से अधिक कॉलेज निजी क्षेत्र में हैं। JEE, NEET, UPSC की तैयारी के लिए कोटा, दिल्ली जैसे शहरों में लाखों की फीस वाली कोचिंग इंडस्ट्री खड़ी हो गई। शिक्षा अब ‘सेवा’ नहीं, ‘उद्योग’ बन गई है।
फीस की दीवार शिक्षा में भेदभाव को बढ़ावा देती हैं।
निजी स्कूलों की न्यूनतम फीस 3000-7000 रु महीना है। अच्छे CBSE स्कूल 1.5 -3 लाख सालाना लेते हैं। इंजीनियरिंग-मेडिकल की फीस 10-25 लाख तक जाती है। NSSO डेटा बताता है कि SC-ST परिवारों की औसत मासिक आय मात्र 8,000-10,000 रु है। ऐसे में गरीब दलित-पिछड़ा परिवार अपने बच्चों को निजी संस्थानों में भेज ही नहीं सकता। सरकारी स्कूलों की बदहाली और निजी की ऊंची फीस के बीच ये वर्ग पिस रहा है। आरक्षण का निष्प्रभावी होना भी एक प्रमुख कारण हैं। संविधान ने सरकारी संस्थानों में SC-ST-OBC को आरक्षण दिया ताकि सदियों का भेदभाव खत्म हो। पर निजी संस्थानों में आरक्षण लागू नहीं होता। जब 70% इंजीनियरिंग-मेडिकल सीटें प्राइवेट कॉलेजों में हैं, तो आरक्षण का लाभ सीमित हो जाता है। 2005 में 93वां संविधान संशोधन निजी संस्थानों में भी आरक्षण की बात करता है, पर सुप्रीम कोर्ट के फैसलों और राजनीतिक इच्छाशक्ति के अभाव में यह लागू नहीं हुआ। महंगे निजी स्कूलों में दलित-पिछड़े बच्चों के साथ सामाजिक भेदभाव की घटनाएं भी आती रहती हैं। टिफिन अलग, बेंच अलग, उपनाम से चिढ़ाना—ये सब आज भी है। ऊपर से सस्ते निजी स्कूल ‘दुकान’ बनकर रह गए हैं, जहां शिक्षा के नाम पर सिर्फ डिग्री बांटी जाती है। न प्रशिक्षित शिक्षक, न लैब, न खेल का मैदान। गरीब का बच्चा महंगी फीस देकर भी गुणवत्तापूर्ण शिक्षा से वंचित है। आम जनता पर इसका दुष्प्रभाव पड़ने लगता है।
शिक्षा कर्ज का जाल बनती जा रही हैं। मध्यम वर्ग भी निजी शिक्षा की महंगाई से त्रस्त है। एजुकेशन लोन लेकर इंजीनियरिंग-मेडिकल कराया जाता है। नौकरी न मिले तो पूरा परिवार कर्ज में डूब जाता है। NSSO 2018 के अनुसार भारत में 13% से अधिक परिवार शिक्षा पर कर्ज ले चुके हैं।
जब सरकारी तंत्र की उपेक्षा होने लगती हैं और सक्षम लोग अपने बच्चों को निजी स्कूलों में भेजने लगे, तो मानो सरकारी स्कूलों पर निगरानी खत्म हो गई हैं। शिक्षक नहीं, भवन जर्जर, शौचालय नहीं—क्योंकि इन स्कूलों में अब सिर्फ सबसे गरीब का बच्चा पढ़ता है। ‘शिक्षा का अधिकार कानून’ बस कागजों पर सिमटकर रह गया है। कोचिंग संस्कृति और मानसिक दबाव की बढती प्रवृत्ति छात्रहित के अनुरूप नहीं है। नीट, सीयुईटी की तैयारी करने के लिए छात्र अपने साथ कोटा में 2 से तीन साल और हम लाखों की फीस चुकाते है। NEET-JEE में चयन न हो तो बच्चे अवसाद में चले जाते हैं। यह व्यवस्था सिर्फ पैसे वालों के लिए है। गांव का प्रतिभाशाली बच्चा संसाधनों के अभाव में दौड़ से बाहर हो जाता है।
निजीकरण को पूरी तरह गलत कहना सही नहीं। कई निजी संस्थान गुणवत्तापूर्ण शिक्षा दे रहे हैं। पर जब शिक्षा मुनाफे का जरिया बन जाए और सरकार अपनी जिम्मेदारी से मुंह मोड़ ले, तब खतरा बढ़ता है। सरकार दलित, पिछड़े व अल्पसंख्यक लोगो के लिए न्यूनतम आरक्षण व्यवस्था लागु करे। सरकारी स्कूलों का पुनरुद्धार करना सरकार की प्राथमिकता होनी चाहिए। दिल्ली और तमिलनाडु मॉडल दिखाते हैं कि राजनीतिक इच्छाशक्ति हो तो सरकारी स्कूल भी प्राइवेट को टक्कर दे सकते हैं। शिक्षक भर्ती, प्रशिक्षण, स्मार्ट क्लास पर खर्च बढ़ाना होगा।
निजी क्षेत्र का नियमन होना चाहिए। फीस निर्धारण समिति, शिक्षक योग्यता, बुनियादी ढांचे की सख्त जांच जरूरी है। कैपिटेशन फीस पर पूरी रोक लगे। आरक्षण का विस्तार किया जाना आवश्यक हैं। निजी उच्च शिक्षण संस्थानों में भी SC-ST-OBC आरक्षण लागू हो। संसद में इस पर कानून बनना चाहिए। स्कॉलरशिप और लोन माफी योजनाएं लागी की जाए। दलित-पिछड़े छात्रों के लिए फीस-भरपाई योजना, ब्याज-मुक्त लोन और समय पर स्कॉलरशिप मिले।
निष्कर्षः बाबासाहेब डाॅ बीआर आंबेडकर ने कहा था—’शिक्षा शेरनी का दूध है, जो पिएगा वो दहाड़ेगा’। पर जब दूध ही इतना महंगा हो जाए कि गरीब उसे खरीद न सके, तो फिर दहाड़ेगा कौन? शिक्षा का निजीकरण अगर अनियंत्रित रहा तो यह सामाजिक न्याय की हत्या करेगा। अमीर और गरीब के बीच की खाई और चौड़ी होगी। दलित-पिछड़े फिर से हाशिये पर धकेल दिए जाएंगे। इसलिए जरूरत है समुचित संतुलन की। निजी क्षेत्र को जगह मिले, पर शिक्षा मौलिक अधिकार बनी रहे। क्योंकि जिस देश में गरीब का बच्चा डॉक्टर-इंजीनियर न बन सके, वह देश कभी ‘विश्वगुरु’ नहीं बन सकता। शिक्षा सबकी हो, सस्ती हो, और समान हो—तभी ‘सबका साथ, सबका विकास’ का नारा सार्थक होगा।
मुन्ना राम मेघवाल।
कोलिया, डीडवाना, राजस्थान।













