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गीत

मोहन ले चल नदियां पार।
पाए अब जीवन का सार।।
पढ़ले प्रेम के ढाई अक्षर,
खुल जाएं आनंद का द्वार।।

साथ तेरा सुंदर पाकर।
वृंदावन सा जीवन भाए।
गुमसुम वीराने जीवन में,
बहार फिर मोहक छाए।।
पाकर प्रेम तेरा अपार..

ये मन फूलों का डेरा हो।
तेरी बाहों का घेरा हो।।
वीराने गुमसुम जीवन में,
प्रेम अनुपम तेरा मेरा हो।।
हो प्रेमयुक्त अपना संसार..

होठों पर तेरा नाम हो।
मेरे मन में तेरा मुकाम हो।।
आनंद की कभी न शाम हो।
जीवन पावन ब्रजधाम हो।।
बज उठे मधुर मीठा सितार….

तुझे छूकर चंदन हो जाऊं।
मैं मोहक निधिवन हो जाऊं।।
अपने मन में तुझे बसाऊं।
मै तुझ में लय हो जाऊं।।
भूल जाऊं अपना संसार..

तेरी झील सी आंखों में।
रूप अपना हरदम देखूं मैं।।
मनहर स्पर्श पाकर तुम्हारा,
हर्षित मन ही मन होऊं में।।
सुंदर नेह पाया तुम्हार..

निश्चल है यह प्रेम हमारा।
एक दूजे में विलय हमारा।।
अवनी अंबर सूरज तारा,
अदभुत देखेगे प्रेम हमारा।।
सागर सिंधु सरिता हमार..

गीतकार मनोहरसिंह चौहान मधुकर

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