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प्रेम : समर्पण से दिखावे तक

जो छोड़कर जाने वाला हो,
वह एक दिवस चला जाता है।
रोक सकोगे कैसे उसको,
जो पहले ही मन से जाता है।

वह अपना था ही कब आखिर,
बस कुछ पल साथ निभाया था।
जिसका तन-मन कहीं और हो,
उसने केवल भ्रम फैलाया था।

अपना कभी एहसान न गिनता,
न प्रेम का मूल्य लगाता है।
हृदय में स्थान देकर सबको,
हर रिश्ता सच्चा निभाता है।

आज प्रेम और मित्रता भी,
सुविधा का साधन बनते हैं।
स्वार्थ सिद्ध होते ही अक्सर,
अपने भी पराये लगते हैं।

दिल लगाने की बातें लाखों,
हर चौखट पर सुनने को हैं।
पर सच्चे मन से साथ निभाएँ,
ऐसे लोग कहाँ अब हैं?

कभी प्रेम था पूजा जैसा,
त्याग-तपस्या उसकी शान।
विश्वासों की निर्मल धारा,
समर्पण था उसकी पहचान।

अब रिश्तों के इस बाज़ार में,
भावनाओं का मोल लगे।
दिखावे की चकाचौंध में,
सच्चे रिश्तों पर धूल जमे।

फिर भी प्रेम की पावन ज्योति,
अब तक जग में जलती है।
छल-कपट और स्वार्थ बीच भी,
आशा बनकर पलती है।

जो प्रेम आत्मा से उपजे,
उसका अंत नहीं होता।
सच्चा अपना साथ निभाता,
प्रेम कभी व्यापार न होता।

राधा का प्रेम दिव्य कहानी,
मीरा भक्ति का आधार।
एक ने कृष्ण को प्राण बनाया,
दूजी ने किया स्वयं अर्पण अपार।

मीरा ने केवल प्रेम न किया,
जीवन कृष्णमय कर डाला।
हर श्वास में उनका नाम बसाकर,
अपना अस्तित्व उन्हीं को सौंप डाला।

जहाँ “मैं” और “तुम” मिट जाएँ,
वहीं प्रेम की सीमा होती।
प्रेमी की हर धड़कन जाकर,
प्रियतम में ही लीन होती।

शिरीं-फ़रहाद, लैला-मजनूँ,
प्रेम अमर जिनका गान हुआ।
एक की पीड़ा दूसरे की बन,
हृदयों का संगम महान हुआ।

देवदास और पारो की कथा,
विरह का अमर अध्याय बनी।
मिलन अधूरा भले रहा हो,
पर प्रेम की ज्योति अमिट रही।

सच्चा प्रेम वही कहलाए,
जिसमें विश्वास-समर्पण हो।
जो केवल शब्दों तक न सीमित,
जीवन भर का अर्पण हो।

प्रेम न अधिकार जताता है,
न बंधन की दीवार बने।
मुक्त गगन का पावन पंछी,
आत्मा से आत्मा तक तने।

प्रेम प्राप्ति नहीं, त्याग है,
प्रेम स्वार्थ नहीं, अनुराग है।
प्रेम देह नहीं, आत्मा का स्पर्श,
यही प्रेम का सच्चा आदर्श है।

प्रेम जहाँ समर्पण बन जाए,
वहीं से उसका अमर सफ़र आरम्भ होता है।

रूपेश कुमार
चैनपुर, सीवान, बिहार

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