
नेत्र दान, महा दान,
है मानवता का मान।
किसी को दे नेत्रदान,
पुण्य तो कमाइए।।
रंग दुनियाँ के देखें,
आशा की किरण देके।
सदाचारी मानव का,
धर्म तो निभाइए।।
कुछ भी न जाता साथ,
पुण्य को बढ़ाये हाथ,
धरा ये दधीचि की दे,
नेत्र दान जाइए।।
लें संकल्प नेत्रदान,
काम है बड़ा महान।
मृत्यु बाद होती दान,
सबै समझाइए।।
भगवानदास शर्मा “प्रशांत”
शिक्षक सह साहित्यकार
इटावा उत्तर प्रदेश













