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जख्मों की जागीर

हालात ने बहुत बार तोड़ा मुझे,
लेकिन हर बार मैंने खुद को संभाला है।
आँखों में आँसू भी आए कई दफा,
फिर भी चेहरे पर मुस्कान को पाला है।

लोगों ने छोड़ा, वक्त भी बदल गया,
पर मैंने अपने हौसलों को नहीं हारा है।
अंधेरों ने घेरा था हर तरफ से,
फिर भी उम्मीद का दिया जलाया है।

अब किसी से ज्यादा उम्मीद नहीं,
बस खुद पर भरोसा बनाया है।
जो दर्द मिला, उसे ताकत बना लिया,
जो खो गया, उसे भुलाना सीख लिया।

एक दिन मेरी मेहनत रंग लाएगी,
ये विश्वास आज भी दिल में समाया है।
मैं टूटा जरूर हूँ, मगर ख़त्म नहीं हुआ हूँ।
आज भी मेरे होंसला बुलंद है

मैं गिरा जरूर हूँ, मगर रुका नहीं हूँ,
मंजिल अभी दूर है, ये माना है।
हर ठोकर ने मुझे चलना सिखाया,
हर ज़ख्म ने मुझे लड़ना सिखाया है।

ताने सुन-सुनकर पत्थर हो गया दिल,
अब इन बातों से डरना कैसा?
जिस आग में जलाया दुनिया ने मुझको,
उसी आग से मैंने सोना तपाया है।

कल जो हँसते थे मेरी मजबूरी पर,
आज वो मेरी खामोशी से घबराते हैं।
मैं शोर नहीं करता मेहनत का,
मेरे काम की गूंज उन्हें सुनाई देगी।

अंतर्राष्ट्रीय
हास्य कवि व्यंग्यकार
अमन रंगेला ‘अमन’ सनातनी
सावनेर नागपुर ( महाराष्ट्र)

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