
डाक्टर दीपक गोस्वामी
मानवीय व्यवहार वैज्ञानिक
आप देश के चर्चित लेखक,मोटिवेशनल स्पीकर, ट्रेनर,सामाजिक कार्यकर्ता है।
सुनो मित्रो, सुनो। यह कथा उस दिव्य परम आदरणीय पदार्थ की है जो न अन्न है न व्यंजन, अपितु स्वयं में एक सम्पूर्ण सृष्टि है। इसका नाम है झालमूड़ी। यह वह दिव्य प्रसाद है जिसे पाकर दरिद्र भी स्वयं को राजा समझता है और राजा भी सिंहासन छोड़कर ठेले के सम्मुख नतमस्तक हो जाता है।
पहले सामाजिक दर्शन समझो। झालमूड़ी के ठेले पर न कोई ऊँचा है न कोई नीचा। वहाँ धनिक की मोटरगाड़ी और श्रमिक की साइकिल एक ही पंक्ति में खड़ी होती है। न कुल पूछा जाता है, न गोत्र। बस एक प्रश्न होता है, तीखा या मध्यम। यह वह भूमि है जहाँ भेदभाव का वृक्ष कभी पनप ही नहीं सका। यहाँ निर्धन भी दस मुद्रा देकर उतना ही अधिकार पाता है जितना लक्ष्मीपति। यह समता का जीवंत उदाहरण है। गाँव की चौपाल से लेकर नगर के चौराहे तक, इसका न्याय सबके लिए समान है।
अब आर्थिक शास्त्र की बात करो। बीस मुद्रा में जो तृप्ति, जो संतोष, जो वार्तालाप का आनंद मिलता है, वह बड़े भोज में भी दुर्लभ है। यह सकल राष्ट्रीय प्रसन्नता सूचकांक को सीधे चार सौ बीस अंक ऊपर ले जाती है। यह मुद्रास्फीति से अप्रभावित रहने वाली एकमात्र वस्तु है। जब सब कुछ महँगा हो जाए, तब भी झालमूड़ी वाला कहता है, बाबू, दाम वही पुराना। यह निर्धन का बैंक है, विद्यार्थी का जलपान गृह है, और प्रेमियों का प्रथम भोज है। इसके कारण कितने ही व्यापार चलते हैं। मुरमुरे बनाने वाले, मूंगफली भूनने वाले, प्याज उगाने वाले, नींबू बेचने वाले, सबकी जीविका इससे जुड़ी है। यह अपने आप में एक लघु उद्योग है।
राजनीतिक विवेचना सुनो तो हँसी रोके न रुके। झालमूड़ी बनाने की प्रक्रिया ही राजनीति की आधारभूत कार्यवाही ही है। पहले मुरमुरे रूपी जनता को डाला जाता है। फिर मूंगफली रूपी दल-बदलू सदस्य मिलाए जाते हैं। ऊपर से प्याज टमाटर रूपी गठबंधन के साथी डाले जाते हैं। हरी मिर्च रूपी विपक्ष का तीखापन आवश्यक है। फिर सरसों तेल रूपी सत्ता का प्रभाव डाला जाता है। अंत में नींबू निचोड़ कर जनता को खट्टा अनुभव कराया जाता है और काला नमक रूपी आश्वासन छिड़का जाता है। लो, बन गई सरकार। किसी को तोड़ो, किसी को जोड़ो, किसी को मिला कर चलाओ। यही झालमूड़ी नीति है। यदि संयुक्त राष्ट्र संघ में वक्ता के स्थान पर झालमूड़ी का दोना रख दिया जाए, तो सारे प्रस्ताव बिना विरोध के पारित हो जाएँ, क्योंकि बोलने से पूर्व ही सबका मुख भरा होगा।
कूटनीति में इसकी महत्ता अपार है। दो विरोधी राष्ट्रों के प्रधान यदि एक दोना साझा कर लें, तो सीमा पर शांति स्थापित हो जाए। यह गुटनिरपेक्षता का मूल मंत्र है। न यह किसी की ओर, न किसी के विरुद्ध। बस अपने स्वाद में मस्त। यह वह दूत है जिसे वीजा की आवश्यकता नहीं। बंगाल से लेकर पंजाब तक, बिहार से महाराष्ट्र तक, इसका साम्राज्य बिना युद्ध के स्थापित है।
मनोवैज्ञानिक धरातल पर यह विषाद की सबसे सस्ती औषधि है। शोध बताते हैं कि झालमूड़ी का प्रथम कौर मुख में जाते ही मनुष्य के मुखमंडल की सड़सठ मांसपेशियाँ एक साथ सक्रिय होकर मुस्कान उत्पन्न करती हैं। चिंता, तनाव, अवसाद, सब चार कौर में विलीन हो जाते हैं। यह हृदय के घाव पर नींबू का रस नहीं, अपितु मलहम है। परीक्षा में अनुत्तीर्ण छात्र हो या प्रेम में असफल युवक, दोने के साथ बैठते ही उसे लगता है कि जीवन फिर से सुंदर है।
अब वैज्ञानिक दृष्टिकोण से परखो। मुरमुरे में वायु तत्व प्रधान है, इसलिए हल्का है। मूंगफली में पृथ्वी तत्व है, इसलिए शक्ति देती है। सरसों तेल में अग्नि तत्व है, जो जठराग्नि प्रदीप्त करता है। नींबू रस में जल तत्व है, जो शीतलता देता है। नमक में आकाश तत्व है, जो स्वाद को विस्तार देता है। इस प्रकार पंचमहाभूत का ऐसा संतुलन बड़े बड़े वैज्ञानिक भी प्रयोगशाला में नहीं बना सके। जब दांतों तले मुरमुरे चटकते हैं, तो उस ध्वनि से मस्तिष्क में आनंद की तरंगें उठती हैं। यह ध्वनि चिकित्सा भी है।
भौगोलिक विस्तार देखो तो आश्चर्य होगा। पर्वत पर, मरुस्थल में, समुद्र तट पर, सर्वत्र यह उपलब्ध है। वर्षा ऋतु में इसका स्वाद दोगुना हो जाता है। भीगते हुए, ठिठुरते हुए, जब गर्मागर्म झालमूड़ी मिल जाए, तो स्वर्ग का सुख फीका लगे। विद्यालय के द्वार पर, महाविद्यालय के मार्ग पर, रेलगाड़ी के स्थानक पर, जहाँ भी मानव बस्ती है, वहाँ झालमूड़ी का ठेला अवश्य मिलेगा।
लौकिक जीवन में यह संबंधों को दृढ़ करने वाला सूत्र है। रूठे हुए मित्र को मना लो, क्रोधित पत्नी को प्रसन्न कर लो, बस एक दोना पर्याप्त है। चुनाव के समय इसका वितरण मतदाताओं को रिझाने का सबसे सफल साधन है। बालक के जन्मदिन पर केक भले न आए, पर झालमूड़ी अवश्य आती है।
पारलौकिक कथा भी सुनो। कहते हैं कि देवताओं के राजा इंद्र के दरबार में जब अमृत का पान समाप्त हो जाता है, तो अप्सराएँ पृथ्वी पर उतर कर झालमूड़ी खाती हैं। यदि वैदिक काल में यह उपलब्ध होती, तो विश्वामित्र की तपस्या मेनका नहीं, अपितु झालमूड़ी की सुगंध भंग करती। ऋषि मुनि भी कंद मूल फल त्याग कर इसी के दोने के लिए लालायित हो जाते।
व्यावहारिक जीवन में इसके नियम भी हैं। इसे खड़े होकर, ठेले को घेरकर, मित्रों के साथ खाना चाहिए। एकाकी खाने में वह आनंद नहीं। इसे खाते समय वार्तालाप अनिवार्य है। राजनीति, सिनेमा, पड़ोस, सब पर चर्चा इसके साथ ही शोभा देती है।
परंतु सावधान। यह जितनी आकर्षक है, उतनी ही नटखट भी है। प्रथम भेंट में यह जिह्वा पर नृत्य करती है। द्वितीय भेंट में उदर में गुड़गुड़ाहट उत्पन्न करती है। तृतीय भेंट में हरी मिर्च बनकर नेत्रों से जलधारा बहा देती है। यह मन ही मन घाव करने वाली प्रिया है। एक बार इसका चसका लग जाए, तो व्यक्ति मोह माया त्याग कर ठेले की परिक्रमा करता रहता है। यह वह मादकता है जिसका कोई उपचार नहीं।
अंत में बस इतना ही कहूँगा। जिसने झालमूड़ी नहीं चखी, उसने जीवन का रस नहीं जाना। जिसने दूसरों को नहीं खिलाई, उसने मित्रता का धर्म नहीं निभाया। यह व्यंग्य नहीं, जीवन दर्शन है। यह स्वाद नहीं, संस्कृति है। यह भोजन नहीं, भावना है।
तो आओ, आज प्रतिज्ञा करें। जब तक श्वास चले, तब तक झालमूड़ी के जयकारे लगाते रहें। बोलो मन के जादूगर, जिह्वा के महाराजा, स्वाद के सम्राट, झालमूड़ी महाराज की सदा जय हो, जय हो, जय हो। अब उठो, और निकट के ठेले पर भीड़ बढ़ाओ, क्योंकि कल का क्या भरोसा, पर झालमूड़ी आज अमर है।













