
इस जहाँ में दो तरह के लोग नज़र आते हैं,
कुछ ज़मीं पर हैं, कुछ ज़मीं पर भी कहाँ रहते हैं।
एक हक़ीक़त की धूप में उम्र गुज़ारते हैं,
अपने किरदार से हर मोड़ पे पहचान रखते हैं।
ख़्वाब आँखों में सजाते हैं मगर होश के साथ,
पाँव मिट्टी में, मगर सोच में उड़ान रखते हैं।
दूसरे लोग हैं जो वहम के जंगल में गुम,
जिस्म दुनिया में, मगर दिल कहीं और रखते हैं।
आईना सच का दिखे तो नज़रें फेर लेते हैं,
अपने भ्रम को ही हमेशा वो जहाँ रखते हैं।
वक़्त जब सामने लाता है हक़ीक़त की किताब,
तब ये एहसास कि ख़ुद से भी कहाँ रहते हैं।
आर. एस. लॉस्टम इतना ही फ़लसफ़ा है ज़िंदगी का,
जो ज़मीं से जुड़े हों, वही आसमान रखते हैं।॥
आर. एस. लॉस्टम













