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बुला रहा है मेरा गांव

प्रकृति की मनोहारी आभा विखेरता मेरा गांव
बीता बचपन  बुला रहा है देती यादें शीतल छांव
यहां चलती गरम हवा मनभावन वयार बहे वहां
जल थल नभ सब अनुकूल तू वंचित रहा यहां
पाप कर्म किये हैं तूने तभी जा नसका अपने गांव
स्वर्ग सम प्रकृति छोड प्रदूषण में पल रहा यहां
साफ पानी स्वच्छ हवा प्रकृति के उपहार जहां
देव तरसते देवभूमि को तू छोड उसे पडा यहां
घर घर ताले जडे हुये हैं खंडहर हो गए हैं गांव
सूनी पडी चौपाल जहां बंजर हो गये खेत वहां
तुम सबने मुख मोड लिया कराह रहे हैं सारे गांव
टूटे घर सिसक रहे हैं बुला रहे हैं छूटे ठांव
अब तो बिजली पानी सडक घर तक आ गए
आ बस जावो चहल पहल कर दो अपने गांव।

गोवर्धन थपलियाल

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