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पिता- जीवन के अडिग आधार

पिता जीवन की वह छाया, जो हर पल साथ निभाती है,
अपने सपनों को त्याग सदा, संतानों को मुस्काती है।

धूप स्वयं सह लेते हैं, पर छाँव हमें दे जाते हैं,
संघर्षों के कठिन पथों पर, चलना हमें सिखाते हैं।

उनके श्रम की हर बूँदों में, परिवार का सम्मान बसा,
उनके दृढ़ संकल्पों से ही, घर-आँगन का उत्थान बसा।

पिता प्रेम का गहरा सागर, अनुशासन का रूप महान,
उनके आदर्शों से मिलता, जीवन को सच्चा सम्मान।

मौन रहकर भी हर पीड़ा, अपने मन में सहते हैं,
संतानों की खुशियों हेतु, दिन-रात निरंतर रहते हैं।

गिरने पर उँगली पकड़-पकड़, चलना हमें सिखाते हैं,
साहस, धैर्य और कर्मनिष्ठा के, पाठ सहज पढ़ाते हैं।

उनके त्याग और तपस्या का, मूल्य नहीं आँका जाता,
पिता का ऋण इस जीवन में, कभी नहीं चुकाया जाता।

ईश्वर का अनुपम उपहार, पिता का पावन साया है,
उनके चरणों में ही हमने, जीवन का सुख पाया है।

आओ उनके सम्मान में, श्रद्धा के दीप जलाएँ हम,
पिता के अमूल्य महत्व को, हृदय में सदा बसाएँ हम।

जिनके कारण मिला जगत में, अस्तित्व और पहचान हमें,
ऐसे पूज्य पिता को अर्पित, शत-शत नमन, प्रणाम उन्हें।


डाॅ सुमन मेहरोत्रा’ सुरभि’
मुजफ्फरपुर, बिहार

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