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काश हम कभी ना मिलते

हम कभी ना मिलते तो अच्छा होता,
तेरे चेहरे का जादू ना चला होता तो अच्छा होता।
ना तेरी झूठी मोहब्बत पर यक़ीन किया होता,
ना ख़्वाबों का महल यूँ ढहा होता तो अच्छा होता।

दिल का टूटना शायद मुक़द्दर की बात है,
हर प्रेम की अपनी एक सौगात होती है।
पर तुझसे इश्क़ ना किया होता अगर ज़िंदगी में,
तो दर्द का ये समंदर ना मिला होता तो अच्छा होता।

अब तेरी यादों से रिश्ता निभा रहे हैं हम,
अपने ज़ख्मों को मुस्कान में छुपा रहे हैं हम।
सोचते हैं अक्सर तन्हाई की लंबी रातों में,
तुझसे दिल ना लगाया होता तो अच्छा होता।

वक़्त ने सिखा दिया हर रिश्ते का फ़साना,
कौन अपना है और कौन है बेगाना।
जो मिला था कभी ख़ुशी बनकर मेरी राहों में,
वही ग़म बनकर ना मिला होता तो अच्छा होता।

आज भी तेरी यादें दिल को रुला जाती हैं,
बीते लम्हों की तस्वीरें सामने ला जाती हैं।
मगर अब यही दुआ निकलती है मेरे लबों से,
हम कभी ना मिलते ज़िंदगी में तो अच्छा होता॥

रूपेश कुमार
स्वतंत्र लेखक
चैनपुर, सीवान ,बिहार

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