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गधे को बाप बनाना (लघुकथा)

एक बहुत ही बड़ा कंजूस साहूकार था। वह अपनी दुकान

का सामान कभी उधार नहीं देता था। ना ही किसी ग्राहक को छुट्टा पैसा लौटाता था। जब भी कोई सामान लेने आता…. बोलता था कि छुट्टा नहीं है। रोज-रोज की यही उसकी आदत थी। कुछ ग्राहक तो ध्यान नहीं देते थे… छोड़ो कोई बात नहीं…?पर कुछ ग्राहक आपस में बातें किया करते थे कि साहूकार की आदत बहुत खराब हो गई है…. जब देखो बोलता है कि छुट्टा नहीं है…. मक्कार हो गया है… कंजूस हो गया है…। बूढ़ी औरत ने कहा-साहूकार की ऐसी की तैसी
मैं इसकी मक्कारी समझती हूं।
इसकी आदत को छुड़ाना होगा।
बूढ़ी औरत उसके दुकान पर पहुंचती है और साहूकार से कहती है… “अरे बेटा! तेरा दुकान तो खूब चल रहा है.. इस इलाके में सभी लोग तुझे जानते हैं.. तेरी खूब तारीफ करते हैं… तेरे जैसा इस इलाके में नहीं। अच्छा चल! तू मुझे 5 किलो ,आटा 5 किलो चावल, तेल ,चीनी ,चाय पत्ती जल्दी से दे दे ,मेरे घर बहुत मेहमान आए हैं।
साहूकार ने कहा-“मैंने सारा सामान दे दिया है.. सामान ले कर जा… मेहमानों की आवभगत कर। और हां पैसे देते जाना …
बूढ़ी औरत ने कहा-वो क्या है ना बेटा! पैसे तो मैंने पूरे रखे थे… पर लगता है रास्ते में गिर गए…. बाद में कुछ पैसे दे दूंगी।
बूढ़ी औरत लोगों के बीच पहुंची… और बोली-आज मैंने”साहूकार को गधे का बाप बनाया “सब को परेशान करता था। आज मैं उसे परेशान की हूं।

डॉ मीना कुमारी परिहार

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