
अरावली के शौर्य शिखर, मेवाड़ के अभिमान थे,
मातृभूमि की रक्षा हेतु, प्रताप स्वयं बलिदान थे।
झुकना जिनको स्वीकार न था, स्वाभिमान पुकार रहा,
हर संकट में वीर हृदय, रण का दीपक धार रहा।
चेतक जैसा अश्व अनोखा, जिसका यश जग गाता है,
स्वामी-भक्ति का अनुपम उदाहरण, मन को हर्षाता है।
घास-रोटियाँ खाकर भी जो, धर्म-पथ से डिगे नहीं,
संकट लाखों आए लेकिन, अपने प्रण से हिले नहीं।
हल्दीघाटी की रणभूमि में, गूँजी वीर कहानी थी,
मातृभूमि की आन बचाने, जीवन भर कुर्बानी थी।
आज जयंती पर नमन करें, उस अमर महान सपूत को,
जिसने गौरव दिया देश को, भारत माँ के पूत को।
वीर प्रताप का यश अमर है, अमर रहे बलिदान उनका,
स्वाधीनता का मंत्र सुनाता, गौरवमय अभियान उनका।॥
पीढ़ी-पीढ़ी प्रेरित करती, उनकी गौरवगाथा है,
त्याग, तपस्या, शौर्य, स्वाभिमान की अनुपम परिभाषा है।
भारत-भू के कण-कण में, प्रताप अमर मुस्काते हैं,
राष्ट्रप्रेम की ज्योति जलाकर, नव साहस भर जाते हैं।॥
स्वरचित
डाॅ सुमन मेहरोत्रा ‘सुरभि’
मुजफ्फरपुर, बिहार













