
पगड़ी मेवाड़ी, मूंछों पर ताव था,
अकबर के दरबार में जो न झुका, वो घाव था।
घास की रोटी खाई, पर आन नहीं बेची,
वो प्रताप था, हिंद का स्वाभिमानी जवाब था।
चेतक की टापों से जब धरती दहली थी,
मुग़लों की फ़ौज भी पीछे मुड़ कर भागी थी।
भाले की नोक पर दुश्मन को तोला था,
एक राजपूत ने हुकूमत की नींव हिला दी थी।
जंगल-जंगल भटका, महलों को ठुकराया,
पर दिल्ली के तख़्त को शीश नहीं झुकाया।
कहता था ‘आज़ाद जिएँगे, आज़ाद मरेंगे’,
ग़ुलामी की बेड़ियाँ प्रताप ने खुद तोड़ दी थी।
आज भी हल्दीघाटी गवाह है उस शौर्य की,
जहाँ एक सिपाही पूरी सल्तनत पर भारी था।
अमन कहता है मिट जाओ मगर झुको मत,
यही तो सबक़ हमें प्रताप ने सिखाया था।
जय भवानी, जय महाराणा प्रताप !
अंतर्राष्ट्रीय
हास्य कवि व्यंग्यकार
अमन रंगेला ‘अमन’ सनातनी
सावनेर नागपुर ( महाराष्ट्र)













