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तख्त हिलेंगे

जब मैं बोलूँ तो सन्नाटा चीख़ उठे,
लफ़्ज़ों के पत्थर से शीशे का महल टूटे।

मैं वो आग हूँ जो पानी से नहीं बुझती,
मैं वो सच हूँ जो झूठ की सल्तनत को लूटे।

तुमने समझा था ख़ामोश हूँ, कमज़ोर हूँ,
ये मेरी ख़ामोशी थी, तूफ़ान से पहले की।
अब जो गरजूँगा तो दीवारें दरक जाएँगी,
और तुम्हारी रूह तक काँप जाएगी।

मंच सजाने वालों, कान खोल कर सुन लो,
यहाँ किराये के शेर नहीं दहाड़ते।
यहाँ ज़मीर बोलता है, ज़ख़्म बोलते हैं,
और जब ज़ख़्म बोलते हैं तो तख़्त हिलते हैं।

मैं शायर नहीं, मैं बग़ावत की स्याही हूँ,
काग़ज़ पर नहीं, वक़्त के सीने पर लिखता हूँ।
मिटाना चाहो तो मिटा लो, पर याद रखना,
इतिहास गवाह है — कलम से बड़े इंक़लाब नहीं आते।

अंतर्राष्ट्रीय
हास्य कवि व्यंग्यकार
अमन रंगेला ‘अमन’ सनातनी

सावनेर नागपुर ( महाराष्ट्र)

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