
मणिकर्णिका नाम था, घर में मनु कह बतराई।
नाना के साथ खेली और की। संग पढ़ाई।।
मां भागीरथी पिता मोरोपंत जीनने गोद खिलाया।
बिठूर में चंचलता वश छबीली नाम पाया।।
नाना थे उसके प्रिय सखा, उनके संग रहती थी।
बरछी ढाल कृपाण कटारी, यही सखी सहेली थी।।
पुत्री होकर के जिसमे, सारे पुत्र के गुण भरे थे।
पुत्री रूप में पुत्र पाकर, मोरोपंत हर्षित हुए थे।।
सुंदर सुशील एक वीर, योद्धा सी मनु लगती थी।
पंडित हो राजकुल की, कोई कुंवरानी लगती थी।।
देख सुन गुण वीर छबीली के राव गंगाधर रीझ गए।
विवाह उत्सव हुआ झांसी में सब नर नार झूम गए।।
पुत्र पाया रानी ने वो जल्दी ही काल कवलित हुआ।
पुत्र वियोग में राजा गंगाधर भी तन से जीर्ण शीर्ण हुए।।
राजा का उत्तराधिकारी बनाने आनंद को दत्तक पुत्र लिया।
झांसी का जिसे वारिस मानने से दलहोजी ने इंकार किया।।
रोगी राजा गंगाधर परेशानी में ही स्वर्ग सिधार गए।
झांसी हड़पने हेतु तब दुश्मन एक नही कई तैयार हुए।।
राजा दतिया ओरछा लड़ने आए रानी ने मार भगाए।
रानी सेना में स्त्रियां भी जीनने अद्भुत कुशल थे दिखलाए।।
एलिस बोला रानी से गद्दी छोड़ो रनिवास में वास करों।
कहे रानी झांसी हरगिज नहीं दूंगी चाहे जितने प्रयास करों।।
गद्दार की मदद से अंग्रेजों ने किले पर अधिकार किया।
बच लक्ष्मीबाई जा पेशवा का आतिथ्य स्वीकार किया।।
पीछे पीछे ह्यूरोज आ गया लक्ष्मी से कालपी में भिड़ गया।
पीछे हट लक्ष्मीबाई सेना संग ग्वालियर को प्रस्थान किया।।
ग्वालियर जीत पेशवा को सोपा अद्भुत शोर्य कहानी थी।
कुछ दिन बाद फिर अंग्रेजों ने ग्वालियर हथिया ली थी।।
हुआ युद्ध घनघोर रानी राजरतन नए अश्व पर थी सवार।
सामने नाला नए अश्व से रानी जिसे कर न पाई पार।।
घिरी रानी यहां अंग्रेजों से होने लगे थे वार पर वार।
घायल हो गिर गई सिंहनी हुआ गंगा आश्रम उपचार।।
पीकर गंगा जल रानी ने गंगादास से निज ईच्छा जतलाई।
छू न पाए देह बेरी तब ही मृत्यु उत्सव होगा सुखदाई।।
दृश्य मार्मिक था आंखे बाबा और सेवकों की थी भर आई।
बहते आंसू कह उठे धन्य पुत्री भारत मा की रानी लक्ष्मीबाई।।
गीतकार मनोहर मधुकर













