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विकास की मरीचिका


ज्ञान, ध्यान के साक्षी तरुवर,
इनका सब सत्कार करो!
भूल न होवे इन हाँथों से,
इनका मत संघार करो!!

सुख,समृद्धि,शांति के कारक,
इनसे ही धरती न्यारी!
अपना सुख-दुख त्याग सदा ये,
करते सबकी रखवारी!!

वेद पुराण उपनिषद सारे,
इनकी छाया में उपजे थे!
ऋषि महर्षि योगी ज्ञानी,
आनंदित होकर रहते थे!

हैं अरण्य ही पालक पोषक,
जीव जंतु मानव तन के!
आने वाले कल के भी ,
आधार यही हैं जीवन के!!

वह विकास भी क्या विकास है,
जो विनाश का द्योतक हो!
रोग, शोक, अस्थिरता का जो,
वर्तमान में पोषक हो!!

मृग मरीचिका में विकास के,
जीवन को मत त्रस्त करो!
इन्हें बचाकर ‘जिज्ञासु’ जन,
निर्भय होकर मस्त रहो!!

कमलेश विष्णु सिंह ‘जिज्ञासु’

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