
चीखती आवाजें याद कराती है,
कि जुल्म अभी जहां में जिंदा है।
जाल में फंसी मछली सा इंसा है,
मुखिया की जुबां पे वादा व निंदा है।
अभेद किले सी निर्मित व्यवस्था है,
मुखिया व जन का सियासी खेल है।
सब कुछ वादों सा भटकता फिरता है,
वोट और नोट का आपस में मेल है।
कवि संगम त्रिपाठी













