
धर्म रहा न कर्म रहा, स्वार्थ में डूब अब अधर्म फला।
स्वार्थमय आंधी ने घेर लिया,आपा-धापी वक्त चला।
उपदेश को घर में न माने, अपने हुए सभी सियाने।
बड़ों को देवें उपदेश– तुम्हारे आदर्श अब हुए पुराने।
प्रजा हुई खंड-खंड एक सूत्र में बंधन थे बीते जमाने।
जाति बंधन में बढ़ी कट्टरता, नियम लदे हैं मनमाने।
रिश्ते नाते बिखर गए,मन मिले वहां जी लें दिन चार।
वंशवृद्धि क्या करनी,युवा पूरी करें अब दिली खुमार।
सत्ता रहे सलामत,आम जन चाहे फंस जाए आफ़त।
कल की चिंता में डरे हुए बिगड़े बोल बिगड़ी आदत।
स्वार्थमय हुआ जगत, मानवता पर स्वार्थ की मार।
दिन अब ऐसे आए कलिकाल अब सिर पर सवार।
विज्ञान आज चर्मोत्कर्ष, मानवीय गुणों का अपकर्ष।
करुणा,सत्यप्रेम,दया,बंधुत्व भाव करें पाताल स्पर्श।
महेश शर्मा, करनाल












