
मन में धीरज का समँदर, मुख पर मीठी बात।
बच्चों की खातिर जगे, पिता हमारे रात।।
सब कुछ तुझ पर छोड़ दिया, सौंप दिया सब काम।
पिता तुम्हारी ओट में, मिला हृदय को धाम।।
माया-नगरी त्याग कर, थामी तेरी राह।
मन के भावों को यहाँ, मिली तुम्हारी चाह।।
तेरी चौखट पर झुका, लेकर के विश्वास।
हाथ पिता का सिर रहे, मिटे जगत का त्रास।।
तेरी शरणों की मिली, जो शीतल सी छाँव।
निर्भय होकर सो गया, छोड़ जगत के गाँव।।
चकाचौंध संसार की, अब भावे नहिं मोय।
चरणों में तेरे पिता, जीवन अर्पण होय।।
जीत हार की अब यहाँ, रही न कोई चाह।
तात तुम्हारी सीख ही, मेरी सच्ची राह।।
जितने सपने थे बुने, किए पिता को भेंट।
आशीषों से आपके, मिटे जगत के फेंट।।
वीरानी में जो जले, पिता तुम्हारी सीख।
कभी न माँगी जगत से, मैंने कोई भीख।।
भटकाव था राहों में, मिली न कोई डोर।
पकड़ी उँगली आपकी, मुड़े कदम इस ओर।।
मिटा ‘अहम’ अब देख कर, तात तुम्हारा त्याग।
चरणों की रज जो मिली, जागे सोये भाग।।
जो मेरा सो तेरा अब, रहा न कुछ भी शेष।
पितु चरणों में रँग गया, तज कर सकल कलेश।।
रजनी कुमारी
लखनऊ उत्तर प्रदेश












