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पिता

वो हाथ जो मेरे सिर पर फिरता था,
खुरदरा था, पर उसमें जग भर का प्यार था।
कभी बोला नहीं, “थक गया हूँ मैं”,
बस चुपचाप कंधे पर भार उठाता रहा।

अपनी इच्छाएँ उसने कोने में रख दीं,
मेरी पुस्तकें, मेरे जूते, मेरी फीस चुन ली।
त्योहार पर खुद पुरानी चप्पल पहन ली,
मेरे लिए नया कुरता ले आया।

डाँट में भी उसकी चिंता छुपी होती थी,
“देर से क्यों आया” में ममता बुनी होती थी।
जब गिरा मैं, उसने हाथ नहीं बढ़ाया,
बोला, “उठ, तू खुद उठ सकता है।”

आज जब उसके बाल बादल से सफ़ेद हैं,
हाथ काँपते हैं, पर आशीष वही अडिग है।
मैं चाहूँ तो सारा संसार दे दूँ उसे,
पर उसके त्याग का मोल कहाँ चुका पाऊँगा।

पिता केवल शब्द नहीं, तपस्या का नाम है,
जो बिना कहे हर दुख अपना बना ले।
ईश्वर घर में नहीं मिलते, सच कहूँ तो,
पिता की सूरत में ही ईश्वर मिलते हैं।

आप सभी को पितृ दिवस की हार्दिक शुभकामनाएं


अंतर्राष्ट्रीय
हास्य कवि व्यंग्यकार
अमन रंगेला ‘अमन’ सनातनी
सावनेर नागपुर ( महाराष्ट्र)

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