
ऊँचे महल की नींव भी मिट्टी होती है,
शायद कल को ये मिट्टी ही आसमान छू ले।
आज धूल समझकर पाँव से उड़ा दो मुझको,
क्या पता कल इसी धूल से तुम्हारा राजतिलक हो।
आज मौन हूँ, समय को परख रहा हूँ,
घाव गिनकर मन को तराश रहा हूँ।
मोल लगाओ जितना चाहो अभी,
क्या पता कल ये सौदा तुम्हारे हाथ ना रहे।
पाँव में छाले, पर आँख में आग है,
थका नहीं हूँ, बस भाग्य से प्रार्थना है।
तुम्हारी बोली आज ऊँची लगती है,
क्या पता कल तुम्हारी आवाज़ ना रहे।
मैं टूटा वृक्ष नहीं, बीज हूँ दबा हुआ,
धरती फाड़कर कभी तो निकलूँगा।
अभी चाहो तो छाया में बैठ लो,
क्या पता कल ये वृक्ष तुम्हारे साथ ना रहे।
मेरी चुप्पी को मेरी हार मत समझो,
ये तूफान से पहले की शांति है।
आज झुका हूँ, समय का मान रखकर,
क्या पता कल झुकाने की रीत ना रहे।
हँसी उड़ाते हो मेरी निर्धनता पर,
जान लो, स्वर्ण मिट्टी में ही पलता है।
आज तुम स्वामी, मैं एक सेवक सही,
क्या पता कल ये भेद-भाव ना रहे।
लोहे को पीट-पीट कर धार बनाते हैं,
चोट खाकर ही मनुष्य बलवान होता है।
अभी तुम चोट दे लो जी भरकर,
क्या पता कल सहने की घड़ी तुम्हारी ना रहे।
मैं अकेला चला हूँ पथ पर अपने,
न सहारा चाहा, न दया मांगी।
आज तुम साथ नहीं, कोई बात नहीं,
क्या पता कल तुम्हें मेरा नाम पुकारना ना पड़े।
सर्वाधिकार सुरक्षित मौलिक अधिकार एवं अप्रकाशित रचना
अंतर्राष्ट्रीय
हास्य कवि व्यंग्यकार
अमन रंगेला ‘अमन’ सनातनी
सावनेर नागपुर ( महाराष्ट्र)













