
युद्ध का ऐलान हुआ तो शंख बजे थे,
सिंहासन पर बैठे राजा मुस्कुराए थे।
पर सरहद पर माँ ने बेटे को तिलक किया,
और चुपके से आँचल में आँसू छुपाए थे।
रणभूमि सजी थी बारूद के गहनों से,
धरती माँ के सीने में घाव नए आए थे।
एक तरफ जयकारे, एक तरफ चीखें,
दोनों के सुर मिलकर कोहराम बनाए थे।
तलवारें चमकीं, तीरों ने गीत लिखे,
पर हर वार के साथ कोई सपना मरा था।
जो लौटा विजेता बनकर नगर में,
उसके सीने में भी कोई अपना मरा था।
जीत के झंडे तो महलों पर टाँग दिए,
पर कितने घरों के चिराग बुझा दिए।
इतिहास ने लिखा — “महान विजय हुई”,
पर किसी ने न पूछा कितने सुहाग लुटा दिए।
बच्चों ने पूछा — “बाबा कब आएँगे?”
माँ ने कहा — “बेटा, वो तारा बन गए।”
विधवा के माथे का सिंदूर पूछता है,
क्या यही कीमत थी जो हमसे वसूल लिए?
युद्ध करो, पर पहले ये सोच लेना,
जो बीज बोओगे, वही काटोगे।
खून से सींची हुई ज़मीन पर,
सिर्फ नफ़रत के ही फूल उगाओगे।
मैं इंसानियत का पुजारी, पर कायर नहीं,
ज़रूरत पड़ी तो शस्त्र भी उठाऊँगा।
पर याद रहे, युद्ध अंतिम विकल्प है,
पहले कलम से मैं शांति लिख जाऊँगा।
अंतर्राष्ट्रीय
हास्य कवि व्यंग्यकार
अमन रंगेला ‘अमन’ सनातनी
सावनेर नागपुर ( महाराष्ट्र)













