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ब्रज की रज

विधा : शब्द-सीढ़ी
प्रदत्त शब्द : नन्दलाल, मुकुट, सखियाँ, पायल, गगन

“नन्दलाल” मुरली बजा, हर लेते सब पीर।
ब्रज की रज पावन हुई, सुरभित हुआ समीर। ।

मोर “मुकुट ” सिर सोहता,शोभा अपरम्पार।
श्याम-सलौने रूप पर, वारूँ तन-मन वार॥

“सखियाँ”राधा कृष्ण संग , रचा रहे हैं रास।
प्रेम रंग है बरसता,खिला सरस मधुमास। ।

“पायल” छम -छम बज रही, नाचे प्रेम अपार।
चरण-कमल की छाप से, पावन हो संसार॥

नील “गगन” से देव भी, देखें दिव्य विहार।
लीला राधा-श्याम की, धन्य हुआ संसार॥


डाॅ सुमन मेहरोत्रा ‘सुरभि’
मुजफ्फरपुर, बिहार

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