
अपने जीवन की अब सत्तर की उम्र
पारकर पछत्तर की ओर जा रहा हूँ,
जीवन में बदलाव महसूस कर रहा हूँ,
अंतर्मन से आज़ाद महसूस कर रहा हूँ।
मेरे सगे सम्बन्धियों, मेरी पत्नी, मेरे
बच्चों, दोस्तों से प्यार करने के बाद,
अब मैं स्वयं से प्यार करने लगा हूँ,
एहसास हुआ है कि मैं अब मैं नहीं हूँ।
दुनिया मेरे ही कंधों पर नहीं टिकी है,
मैं ठेले वालों से मोलतोल नहीं करता हूँ,
इसलिए उनको कुछ पैसे अधिक दे
कर मैं मेरी जेब की बचत नहीं करता हूँ।
मैं इस तरह से गरीब को अपना घर
चलाने में थोड़ी मदद कर सकता हूँ,
मैं वापस छुट्टे का इंतजार किए बिना
टैक्सी चालक को भुगतान करता हूँ।
अतिरिक्त धन उसके चेहरे पर एक
ख़ुशी की मुस्कान तो ला ही सकता है,
आखिरकार वह जीने के लिए मुझ
से कहीं ज़्यादा मेहनत जो करता है।
मैंने अपनी उम्र के लोगों को बताना बंद,
कर दिया है कि वे वो कहानी सुना चुके हैं,
आखिर वह कहानी उनकी अतीत की यादें,
ताज़ा कर जीवन का हौंसला देती हैं।
कोई इंसान अगर गलत भी हो तो
मैंने उसको सुधारना बंद किया है,
आखिर सबका ठेका मैने नहीं लिया है,
ऐसी टोकाटोकी से अपनी शांति भली है।
सबकी प्रशंसा उदारता से करता हूँ,
यह न केवल तारीफ प्राप्तकर्ता की
मनोदशा को प्रोत्साहित करता है,
मेरी मनोदशा को भी ऊर्जा देता है।
अब मैंने अपनी शर्ट की क्रीज या धब्बों,
को देख परेशान होना बंद कर दिया है,
मेरा मानना है कि दिखावे की अपेक्षा
व्यक्तित्व ज्यादा महत्वपूर्ण होता है।
आख़िरकार मैं उन लोगों से अब दूर
ही रहता हूँ जो मुझे महत्व नहीं देते,
मैं यह भली भाँति बखूबी जानता हूँ
कि वो मेरी कीमत नहीं पहचानते।
मैं तब शांत रहता हूँ जब कोई मुझे
चूहे की दौड़ से बाहर निकालने के
लिए चूहों सी राजनीति करता है,
मैं चूहों की दौड़ में शामिल नहीं हूँ।
अब तो मैं अपनी भावनाओं से
शर्मिंदा नहीं होना सीख रहा हूं,
आखिरकार जो मानव बनाती हैं,
मुझे वो भावनायें अब मैं जी रहा हूँ।
मैंने सीखा है रिश्तों को तोड़ने से
अहंकार को छोड़ देना बेहतर है,
अहंकार मुझे सबसे अलग रखेगा,
स्नेह अनुराग सबको साथ रखेगा।
मैं वही करता हूं जो मुझे खुशी देता है,
आखिर मैं अपनी खुशी का जिम्मेदार हूँ,
आदित्य सारी दुनियादारी छोड़ चुका,
क्योंकि मैं उस ख़ुशी का हक़दार भी हूँ।
डॉ कर्नल आदि शंकर मिश्र
‘आदित्य’, ‘विद्यावाचस्पति’
‘विद्यासागर’, लखनऊ













