
माता देती जन्म तो, पिता दिखाते राह।
गुरु जीवन को अर्थ दे, हर लेते सब दाह॥
फटकार मिले या डाँट कभी, शब्द सभी उपहार।
गुरु के हर व्यवहार में, छिपा स्नेह भंडार॥
गिरने पर जो हाथ दें, भटकें तो दें ज्ञान।
ऐसे गुरुवर का सदा, इस जग में सम्मान॥
दीपक बनकर स्वयं जलें, दें जीवन उजियार।
गुरु जैसा न कोई तपे, न कोई सहे प्रहार॥
शब्दों से संस्कार दें, कर्मों से दें सीख।
गुरु के पावन ज्ञान से, बदले जीवन-रीत॥
कलम पकड़कर हाथ में, सपनों को दे पंख।
गुरु ही अंधी आँख में, भरते सुंदर रंग॥
शिष्य सफलता पात हैं, गुरु रहते निष्काम।
अपने हिस्से की खुशी, करते उनके नाम॥
कोटि नमन गुरुवर तुम्हें, तुम जीवन आधार।
थाम रखो पतवार तो, जीवन नैया पार।।
भानुप्रकाश शर्मा
(स्वरचित, मौलिक रचना)













