
आज भी यादों के आलिंगन में जीती हूं
वो यादें भुलाए नहीं भूलती, न ही भूल पाऊंगी
जब तुम थी तो मैं बिल्कुल बेफिक्र होकर रहती थी
मेरी प्यारी मां तुम मेरे साथ होती थी
जिंदगी जीने का तजुर्बा सिखाती
जब भी मुझे कुछ समझ में नहीं आता
यह होती कोई परेशानी
मैं तेरे पास दौड़ी -दौड़ी चली आती थी
हर समस्या का समाधान मां तुम थी
हर रोग, हर दर्द की दवा
उनके घरेलू उपायों में थी मौजूद
आज मैं खुद पे शर्मिंदा हूं
बेवजह उनकी बातों को अनदेखा करती
स्वयं को इतना व्यस्त कर ली थी कि
मां से पल भर प्यार की बातें करना बिल्कुल ही भूल गई थी
अनजाने में मैं कितनी गलतियां करती थी
उनका दिल बहुत दुखाती थी
आज हमारी जिंदगी का सिलसिला
यूं ही चल रहा है
पर अब वह मेरी प्यारी मां तो नहीं रही
बस मेरे पास बच्चे हैं
बच्चे स्वयं में व्यस्त रहते,मेरे लिए वक्त नहीं
कभी -सोचती हूं ये जीवन का कालचक्र अभी कैसा है..?
हां ,मैं मां जैसी आदर्शवादी न सही
पर उनके पद चिन्हों पर चलती रही
परिवार को पालने लगी हूं उन्हीं के जैसा जोड़ने लगी हूं
सुख संपन्न होते हुए भी आबाद के क्षणों में भी
बस एक कमी सी पाती हूं
मां का साथ न होने से खुद को तन्हा पाती हूं
पर मुझे ऐसा लगता है कि मां मेरे भीतर ही समाई है
मुझे कभी-कभी गर्व भी महसूस होता है
कि मैं मां का अंश हूं
नतमस्तक है मेरा तन और मन
उसकी यादों का आलिंगन पाकर मैं धन्य हो गई
कोटि-कोटि नमन मां!
डॉ मीना कुमारी परिहार













