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रेगिस्तान के जहाज का पुनर्जन्म: संकट से संरक्षण की ओर बढ़ता राजस्थान का ऊंट

डाक्टर दीपक गोस्वामी
मानवीय व्यवहार वैज्ञानिक
आप देश के चर्चित लेखक,मोटिवेशनल स्पीकर, ट्रेनर,सामजिक कार्यकर्ता है।

रेगिस्तान की तपती रेत पर जब आंधी चलती है, तब एक जीव है जो न रुकता है, न झुकता है। चौड़े पैर, लंबी गर्दन और पीठ पर कूबड़ लिए वह मीलों तक चलता रहता है। इसी कारण उसे रेगिस्तान का जहाज कहते हैं। यह ऊंट है। राजस्थान की पहचान, संस्कृति और अर्थव्यवस्था का अभिन्न अंग। पर यही जहाज आज खुद संकट के सागर में डूब रहा है। 22 जून को अंतर्राष्ट्रीय ऊंट दिवस मनाया गया। संयुक्त राष्ट्र के खाद्य और कृषि संगठन ने ऊंट, लामा, अल्पाका जैसे जीवों के महत्व को समझाने के लिए यह दिन तय किया है। यह दिन हमें याद दिलाता है कि ऊंट केवल पशु नहीं, मरुस्थल की जीवन रेखा है।

राजस्थान सरकार ने 30 जून 2014 को एक ऐतिहासिक फैसला लिया। चिंकारा के साथ ऊंट को भी राज्य पशु घोषित कर दिया गया। अधिसूचना में साफ लिखा गया कि अब ऊंट को मारने वाले को कम से कम एक साल की जेल होगी। मकसद था कि घटती संख्या को रोका जाए। पर आंकड़े बताते हैं कि कानून बनने के बाद हालात सुधरे नहीं, उल्टा बिगड़ गए। 2007 में राजस्थान में 4.22 लाख ऊंट थे। 2012 की पशुगणना में यह संख्या 3.26 लाख रह गई। 2019 तक घटकर 2.13 लाख हो गई। 2021 में अनुमान है कि केवल डेढ़ लाख ऊंट बचे। यानी 2007 से 2021 के बीच 64 प्रतिशत की गिरावट आई। आज राजस्थान में 2007 की तुलना में केवल 20 प्रतिशत ऊंट बचे हैं। पूरे देश में 2012 में चार लाख ऊंट थे जो 2019 में ढाई लाख रह गए। राजस्थान हाईकोर्ट ने भी चिंता जताई है। कोर्ट ने कहा कि ऊंटों की घटती संख्या को लेकर सरकार गंभीर नजर नहीं आ रही। 27 मार्च 2025 तक सरकार से स्थिति स्पष्ट करने को कहा गया था।

सवाल उठता है कि राज्य पशु बनने के बाद भी ऊंट क्यों घटे। जवाब 2015 के कानून में छिपा है। राजस्थान ऊंट वध प्रतिषेध और अस्थायी प्रव्रजन विनियम अधिनियम 2015 लागू हुआ। इसने ऊंट को मारना और राज्य से बाहर ले जाना दोनों प्रतिबंधित कर दिया। नीयत अच्छी थी पर नतीजा उल्टा निकला। पहले बूढ़ा या बीमार ऊंट पालक के लिए बोझ नहीं था। उसे बेचकर पालक 30 से 40 हजार रुपये पा जाता था। ऊंट का चमड़ा, मांस और हड्डी का बाजार था। कानून के बाद यह बाजार खत्म हो गया। अब बीमार ऊंट की कीमत तीन से आठ हजार रुपये रह गई। पशु मेलों में खरीद फरोख्त बंद हो गई। नतीजा यह हुआ कि पालकों ने ऊंट पालना कम कर दिया। जब आमदनी नहीं होगी तो कोई पशु क्यों पालेगा। खेती में ट्रैक्टर आ गए। ढुलाई में पिकअप और ट्रक आ गए। ऊंट की आर्थिक उपयोगिता घटी और कानूनी जटिलता बढ़ी। पालकों ने कहा कि संरक्षण के नाम पर ऊंट को सजा मिल गई।

सरकार ने अपनी गलती सुधारी है। अब बीमा और प्रोत्साहन से ऊंट बचाने की कोशिश हो रही है। मुख्यमंत्री मंगला पशु बीमा योजना के तहत ऊंट की आकस्मिक मृत्यु पर 40,000 रुपये का बीमा कवर मिलता है। पहले केवल एक ऊंट का बीमा होता था। अब एक जनाधार कार्ड पर 10 ऊंटों का फ्री बीमा होता है। यानी एक परिवार को चार लाख रुपये तक का सुरक्षा कवच मिल सकता है। यह बीमारी, दुर्घटना या प्राकृतिक आपदा में मौत पर लागू होता है। इसके अलावा उष्ट्र संरक्षण योजना चल रही है। इसके तहत ऊंट के बच्चे के जन्म पर पालक को 20,000 रुपये दो किस्तों में दिए जाते हैं। पहली किस्त जन्म पर और दूसरी एक साल बाद जब शावक स्वस्थ रहे। जैसलमेर जिले में ही 3300 शावकों पर 3.30 करोड़ रुपये सीधे खातों में भेजे गए।

ऊंट केवल बोझ ढोने का साधन नहीं है। ऊंटनी का दूध औषधीय गुणों से भरपूर है। इसमें कोलेस्ट्रॉल कम और विटामिन सी ज्यादा होता है। बायोएक्टिव पेप्टाइड पाए जाते हैं जो रोग प्रतिरोधक क्षमता बढ़ाते हैं। मधुमेह के रोगियों पर कुछ छोटे शोध हुए हैं जो सकारात्मक संकेत देते हैं। पर ऑटिज्म में फायदे के दावे पर अभी बड़े क्लिनिकल प्रमाण नहीं हैं। दुख की बात है कि इतना गुणकारी दूध बाजार में 50 रुपये लीटर बिकता है। कारण है कि संगठित डेयरी नेटवर्क नहीं है। अमूल ने ऊंटनी का दूध पाउडर बाजार में उतारा है पर अभी मांग कम है। यदि कोल्ड चेन और ब्रांडिंग हो तो यह दूध पालकों की आय बढ़ा सकता है।

ऊंट राजस्थान की संस्कृति में रचा बसा है। पाबूजी राठौड़ लोकदेवता हैं। रेबारी और रायका समाज उन्हें अपना रक्षक मानता है। कोलायत में पाबूजी की ओरण प्रसिद्ध है। बीकानेर का ऊंट उत्सव दुनिया भर के पर्यटकों को खींचता है। जैसलमेर के धोरों में ऊंट सफारी आज भी रोमांच का नाम है। सीमा सुरक्षा बल के जवान आज भी भारत पाकिस्तान सीमा पर ऊंटों से गश्त करते हैं। रेत के टीलों पर जीप नहीं चलती, ऊंट चलता है। यह सामरिक महत्व भी है।

तो समाधान क्या है। पहला, कानून में लचीलापन लाना होगा। बीमार और अनुपयोगी ऊंटों के लिए मानवीय इच्छामृत्यु का प्रावधान हो। बाहर ले जाने पर पूर्ण प्रतिबंध की जगह विनियमन हो। दूसरा, अर्थव्यवस्था खड़ी करनी होगी। ऊंटनी के दूध, ऊन और पर्यटन को जोड़कर पूरा मूल्य चक्र बनाना होगा। तीसरा, युवा पालकों को जोड़ना होगा। उन्हें बताना होगा कि ऊंट पालना घाटे का सौदा नहीं है। चौथा, शोध बढ़ाना होगा। राष्ट्रीय उष्ट्र अनुसंधान केंद्र बीकानेर में है। वहां नस्ल सुधार, रोग नियंत्रण और दूध के औषधीय उपयोग पर और काम हो।

ऊंट बचेगा तो राजस्थान की आत्मा बचेगी। मरुधर की शान ऊंट है। वह केवल अतीत नहीं, भविष्य भी हो सकता है। जरूरत है नीति और नीयत दोनों में संतुलन की। बीमा और शावक प्रोत्साहन अच्छी शुरुआत है। अब बाजार देना होगा। जब पालक को लगेगा कि ऊंट पालना फायदे का काम है, तब वह खुद संरक्षण करेगा। सरकार को केवल पहरेदार नहीं, भागीदार बनना होगा। जिस दिन हर ऊंट पालक के चेहरे पर मुस्कान होगी, उस दिन समझो रेगिस्तान का जहाज फिर से लहरों को चीर रहा है। तभी होगी भारत की जयजयकार। तभी होगा राजस्थान के गौरव का पुनर्जन्म। ऊंट को बचाना है तो उसे बोझ नहीं, अवसर बनाना होगा। यही नए भारत का संकल्प है।

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