Vijay Kumar
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साहित्य
लोकतंत्र का जश्न मनाएं
उठें सुबह फिर निपट नहाएं !पोलिंग बूथ पर जाकर अपने !!अपनो के संग वोट दे आएं !हम अपने कर्तव्य निभाएं…
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साहित्य
किनारे पे बैठा हूँ,
किनारे पे बैठा हूँ, निहार रहा हूँ पतवार,बहती धारा में ढूँढ रहा हूँ—टूटे मकान का आधार। तेज़ जल की कलोल…
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साहित्य
क्या प्यार भी कभी डिजिटल हो सकता है?
प्यार तो महसूस करने वाली एक अनुभूति है क्या इसे डिजिटल बनाया जा सकता हैं? जी यही सवाल है मेरे…
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साहित्य
सिमटते दायरे
जिंदगी में दायरे जबसिमटने लगते हैं, हमबहुत अकेला महसूस करने लगते हैं।वैसे होते तो सब है साथ,इस “अपनों” की भीड़…
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साहित्य
भारत के यशस्वी प्रधानमंत्री श्री अटल बिहारी वाजपेई
उनकी लिखी पंक्तियां आज भी प्रासंगिक है –“काल के कपाल पर लिखता हूंगीत नया गाता हूंअपनों के मेले में मीत…
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साहित्य
चतुष्तैत
(गद्य-सृजन) मानव-जीवन का सत्य केवल बाहरी जगत तक सीमित नहीं है। उसके भीतर भी चार परतें हैं, चार ध्रुव हैं,…
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साहित्य
छल-कपट
(पद्य दोहा छंद) छल के साथी झूठ हैं, कपट सदा ही साथ।सत्य न पावे ज्योति को, अंधकार के हाथ।।1।। कपट…
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साहित्य
प्यारी पाती
मां की आस पिता का संबल,बच्चों की अभिलाषा!प्यारी पाती आती जब थी,पुलकित घर हो जाता!! घरनी घरमें आस लगाएरहती बैठी…
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साहित्य
दृष्टिकोण
दृष्टिकोण को परिवर्तन कर, चश्मे तेरे हेवास्तविक नज़र से देख, सितारे तेरे हे। गर देख पाये तो देख ,वो लहर…
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साहित्य
द्वैत
कहानी बहुत समय पहले की बात है, एक छोटे से गांव में ऋषि वशिष्ठ रहते थे। वह अपने गहन ज्ञान…
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